शिक्षा में खेल - कूद का स्थान
अन्य सम्बन्धित शीर्षक
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“ अपने विगत जीवन पर दृष्टि डालते हए मझे सोचना पडता है कि खेल - कूद के प्रति लापरवाही नहीं दिखानी चाहिए थी । ऐसा करके मैंने शायद असमय प्रौढ़ता की भावना विकसित कर ली । " - सुभाषचन्द्र बोस
निबन्ध - रचना रूपरेखा - ( 1 ) प्रस्तावना , ( 2 ) जीवन में स्वास्थ्य का महत्त्व , ( 3 ) शिक्षा और क्रीडा का सम्बन्ध , ( 4 ) क्रीडा एवं व्यायाम के विभिन्न प्रकार वाभन्न प्रकार , ( 5 ) शिक्षा में क्रीडा एवं व्यायाम का महत्त्व - ( क ) शारीरिक विकास , शिक्षा ( ख ) मानासक विकास , ( ग ) नैतिक विकास . ( घ ) आध्यात्मिक विकास , ( ङ ) शिक्षा - प्राप्ति में हाच , ( 6 ) व्यायाम और शिक्षा का समन्वय , ( 7 ) उपसंहार ।
( 1 ) प्रस्तावना -
खेल मनुष्य की जन्मजात प्रवृत्ति है । यह प्रवृत्ति बालकों , युवकों और वृद्धों तक में पाई जाती है । जो बालक अपनी बाल्यावस्था में खेलों में भाग नहीं लेता , वह बहुत - सी बातें सीखने से वंचित रह जाता ह उसक व्यक्तित्व का भली प्रकार विकास नहीं हो पाता । हमारे पूर्वजों ने मानव - जीवन को 100 वर्ष का माना था । इसमें प्रथम 25 वर्ष विद्याध्ययन एवं शारीरिक पष्टि के लिए निर्धारित किए गए थे । विद्यार्थी अपने अध्ययन - काल म ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए शरीर को पुष्ट बनाते एवं विद्याध्ययन करते थे । इस बात की पुष्टि निम्नलिखित श्लोक स होती है प्रासादस्य विनिर्माणे मूलभित्तिरपेक्षते । तथैव जीवनस्यादौ ब्रह्मचर्यमपेक्षते ॥ अर्थात् जिस प्रकार किसी भवन का निर्माण करने के लिए सुदढ़ नींव की आवश्यकता होती है , उसी प्रकार जीवन के आरम्भ में ब्रह्मचर्य एवं शरीर - पुष्टि की आवश्यकता होती है ।
जीवन में स्वास्थ्य का महत्त्व - स्वास्थ्य जीवन की आधारशिला है । स्वस्थ मनुष्य ही अपने जीवन सम्बन्धी कार्यों को भली - भाँति पूर्ण कर सकता है । हमारे देश में धर्म का साधन शरीर को ही माना गया है । अतः कहा गया है - ' शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् ' । इसी प्रकार अनेक लोकोक्तियाँ भी स्वास्थ्य के सम्बन्ध में प्रचलित हो गई हैं ; जैसे - ' पहला सुख नीरोगी काया ' , ' तन्दुरुस्ती हजार नियामत है ' , ' जान है तो जहान है ' आदि । इन सभी लोकोक्तियों का अभिप्राय यही है कि मानव को सबसे पहले अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए । भारतेन्दुजी ने कहा था दूध पियो कसरत करो , नित्य जपो हरि नाम । हिम्मत से कारज करो , पूरेंगे सब राम । । यह स्वास्थ्य हमें व्यायाम अथवा खेल - कूद से प्राप्त होता है ।
शिक्षा और क्रीडा का सम्बन्ध -
यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि शिक्षा और क्रीडा का अनिवार्य सम्बन्ध है । शिक्षा यदि मनुष्य का सर्वांगीण विकास करती है तो उस विकास का पहला अंग है - शारीरिक विकास । शारीरिक विकास व्यायाम और खेल - कूद के द्वारा ही सम्भव है । इसलिए खेल - कूद या क्रीडा को अनिवार्य बनाए बिना शिक्षा की प्रक्रिया का सम्पन्न हो पाना सम्भव नहीं है । अन्य मानसिक , नैतिक या आध्यात्मिक विकास भी परोक्ष रूप से क्रीडा और व्यायाम के साथ ही जुड़े हैं । यही कारण है कि प्रत्येक विद्यालय में पुस्तकीय शिक्षा के साथ - साथ खेल - कूद और व्यायाम की शिक्षा भी अनिवार्य रूप से दी जाती है । विद्यालयों में व्यायाम शिक्षक , स्काउट मास्टर , एन०डी०एस०आई० आदि शिक्षकों की नियुक्ति इसीलिए की जाती है कि प्रत्येक बालक उनके निरीक्षण में अपनी रुचि के अनुसार खेल - कूद में भाग ले सके और अपने स्वास्थ्य को सबल एवं पुष्ट बना सके ।
क्रीडा एवं व्यायाम के विभिन्न प्रकार - शरीर को शक्तिशाली , स्फूर्तियुक्त और ओजस्वी तथा मन को पर बनाने के लिए जो कार्य किए जाते हैं , उन्हें हम खेल - कूद , क्रीडा या व्यायाम कहते है । खेलकद और व्यायाम तीव गति से रक्त - संचार होता है ; अत : दोड़ , क्रिकेट , फुटबॉल , बैडमिण्टन , टेनिस , हॉकी आदि खेल इसी दष्टि से खेले जाते हैं । इन खेलों के लिए विशेष रूप से लम्बे - चौड़े मैदान की आवश्यकता होती है । अतः ये खेल सब लोग सभी स्थानों पर सुविधापूर्वक नहीं खेल सकत - है । वे अपने शरीर को पुष्ट करने के लिए कछ नियमित व्यायाम करते हैं : जैसे - प्रातः तथा साय खुली वायु में भ्रमण , दण्ड - बैठक लगाना , मुग्दर घुमाना , अखाडे में कश्ती के जोर करना एवं आसन करना आदि । इस प्रकार , खेल - कूद और व्यायाम का क्षेत्र अत्यधिक विस्तृत है और इनके विभिन्न रूप हैं ।
मात्रा में कीडा एवं व्यायाम का महत्त्व -
संकुचित अर्थ में शिक्षा का तात्पर्य पस्तकीय ज्ञान प्राप्त करना मानसिक विकास करना ही समझा जाता है , लेकिन व्यापक अर्थ में शिक्षा से तात्पर्य केवल मानसिक विकास से नहीं है वरन शारीरिक , चारित्रिक और आध्यात्मिक विकास अर्थात् सर्वांगीण विकास से है । सर्वांगीण विकास के शारीरिक विकास आवश्यक है और शारीरिक विकास के लिए खेल - कूद और व्यायाम का विशेष महत्त्व है । शिक्षा के अन्य क्षेत्रों में भी खेल - कूद की परम उपयोगिता है , जिसे निम्नलिखित रूपों में जाना जा सकता है ।
( क ) शारीरिक विकास - शारीरिक विकास तो शिक्षा का मुख्य एवं प्रथम सोपान है , जो खेल - कट और के बिना कटापि सम्भव नहीं है । प्रायः बालक की पूर्ण शैशवावस्था भी खेल - कूद में ही व्यतीत होती है । बिना शिक्षा का और व्यास की शिक्षा खेल - कूद से शरीर के विभिन्न अंगों में एक सन्तलन स्थापित होता है . शरीर में स्फूर्ति उत्पन्न होती है , रक्त - संचार ठीक प्रकार से होता है और प्रत्येक अंग पुष्ट होता है । स्वस्थ बालक ता ह आर प्रत्येक अंग पुष्ट होता है । स्वस्थ बालक पुस्तकीय ज्ञान को ग्रहण करने की . . आधक क्षमता रखता है । अत : पुस्तकीय शिक्षा को सुगम बनाने के लिए भी खेल - कूद आर व्यायाम का आवश्यकता है ।
( ख ) मानसिक विकास - मानसिक विकास की दृष्टि से भी खेल - कूद अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं । स्वस्थ शरीर हा स्वस्थ मन का आधार होता है । इस सम्बन्ध में एक कहावत भी प्रचलित है कि ' तन स्वस्थ तो मन स्वस्थ ' ( Healthy mind in a healthy body ) : अर्थात स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का वास होता हा शरार स दुबल व्यक्ति विभिन्न रोगों तथा चिन्ताओं से ग्रस्त हो मानसिक रूप से कमजोर तथा चिड़चिड़ा बन जाता है । वह जा कुछ पढ़ता - लिखता है , उसे शीघ्र ही भूल जाता है । अत : वह शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाता । खेल - कूद से शारीरिक शक्ति में तो वृद्धि होती ही है , साथ - साथ मन में प्रफुल्लता , सरसता और उत्साह भी बना रहता है ।
( ग ) नैतिक विकास - बालक के नैतिक विकास में भी खेल - कूद का बहुत बड़ा योगदान है । खेल - कूद से शारीरिक एवं मानसिक सहन - शक्ति , धैर्य और साहस तथा सामूहिक भ्रातृभाव एवं सद्भाव की भावना विकसित होता है । बालक जीवन में घटित होनेवाली घटनाओं को खेल - भावना से ग्रहण करने के अभ्यस्त हो जाते हैं तथा शिक्षा - प्राप्ति के मार्ग में आनेवाली बाधाओं को हँसते - हँसते पार कर सफलता के सर्वोच्च शिखर पर पहुँच जाते हैं ।
( घ ) आध्यात्मिक विकास - खेल - कूद आध्यात्मिक विकास में भी परोक्ष रूप से सहयोग प्रदान करते हैं । आध्यात्मिक जीवन - निर्वाह के लिए जिन गुणों की आवश्यकता होती है , वे सब खिलाड़ी के अन्दर विद्यमान रहते हैं । योगी व्यक्ति सुख - दु : ख , हानि - लाभ अथवा जय - पराजय को समान भाव से ही अनुभूत करता है । खेल के मैदान में ही खिलाड़ी इस समभाव को विकसित करने की दिशा में कुछ - न - कुछ सफलता अवश्य प्राप्त कर लेते हैं । वे खेल को अपना कर्त्तव्य मानकर खेलते हैं । इस प्रकार आध्यात्मिक विकास में भी खेल का महत्त्वपूर्ण स्थान है ।
( ङ ) शिक्षा - प्राप्ति में रुचि - शिक्षा में खेल - कूद का अन्य रूप में भी महत्त्वपूर्ण स्थान है । आधुनिक शिक्षाशास्त्रियों ने कार्य और खेल में समन्वय स्थापित किया है । बालकों को शिक्षित करने का कार्य यदि खेल - पद्धति के आधार पर किया जाता है तो बालक उसमें अधिक रुचि लेते हैं और ध्यान लगाते है ; अत : खेल के द्वारा दी गई शिक्षा सरल , रोचक और प्रभावपूर्ण होती है । इसी मान्यता के आधार पर ही किण्डरगार्टन , मॉण्टेसरी , प्रोजेक्ट आदि आधुनिक शिक्षण - पद्धतियाँ विकसित हुई हैं । इसे ' खेल पद्धति द्वारा शिक्षा ( Education by play way ) कहा जाता है । अत : यह स्पष्ट है कि व्यायाम और खेलकूद के बिना शिक्षा के लक्ष्यों को प्राप्त करना असम्भव है ।
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